पूर्व विधायक सुरेश राठौर और उर्मिला के विवाद में कूदीं भावना पांडे, कहा- “स्वार्थ के लिए हो रहा भावनाओं का सौदा”।

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उत्तराखंड में उर्मिला सनावर और पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर के बीच चल रहा विवाद अब एक ‘वार-पलटवार’ के हाई-वोल्टेज ड्रामे में तब्दील हो गया है। इस प्रकरण में तब नया मोड़ आया जब राज्य की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता भावना पांडे ने सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलते हुए उर्मिला सनावर पर गंभीर आरोपों की झड़ी लगा दी।

“सुरक्षा पाने के लिए रचा गया स्वांग” – भावना पांडे भावना पांडे, जिन्होंने शुरुआती दौर में उर्मिला का समर्थन किया था, अब उनके खिलाफ खड़ी नजर आ रही हैं। भावना का दावा है कि उर्मिला सनावर ने Y+ श्रेणी की सुरक्षा हासिल करने के लिए एक सोची-समझी पटकथा (Script) तैयार की। भावना ने आरोप लगाया कि उर्मिला ने अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे बेहद संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दे को अपने निजी स्वार्थ और सरकारी सुरक्षा पाने के लिए एक ‘हथकंडे’ की तरह इस्तेमाल किया।

मदद से लेकर विरोध तक का सफर बता दें कि भावना पांडे ने पहले दर्शन भारती के कहने पर उर्मिला के समर्थन में आने की बात कही थी। लेकिन अब उनका कहना है कि हर दिन बदलती कहानियों और रोज सामने आते नए-नए ऑडियो क्लिप्स की वजह से जनता का भरोसा उर्मिला से कम होता जा रहा है। भावना ने वीडियो जारी कर कहा कि उर्मिला और सुरेश राठौर की आपसी खींचतान में उन्हें मोहरा बनाया गया।

नया ऑडियो और नई किरदार ‘उषा राणा माही’ एक तरफ भावना पांडे हमलावर हैं, तो दूसरी तरफ उर्मिला सनावर ने एक और धमाका किया है। उर्मिला ने ‘उषा राणा माही’ नाम की एक नई किरदार का ऑडियो जारी किया है, जिसमें कथित तौर पर पूर्व विधायक सुरेश राठौर की आपत्तिजनक बातचीत होने का दावा किया गया है। हालांकि, इस ऑडियो की सत्यता की अभी तक किसी भी आधिकारिक एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है।

क्या है Y+ सुरक्षा का गणित? इस पूरे विवाद के केंद्र में Y+ सुरक्षा की चर्चा भी जोरों पर है। भारत में यह सुरक्षा श्रेणी केवल उन्हें दी जाती है जिन्हें ‘हाई थ्रेट’ (बड़ा खतरा) हो। इसके तहत:

  • संबंधित व्यक्ति को 10 से 11 सुरक्षाकर्मियों का घेरा मिलता है।

  • इसमें आमतौर पर 2-3 कमांडो और पुलिसकर्मी शामिल होते हैं।

  • व्यक्ति की हर यात्रा में एक एस्कॉर्ट गाड़ी साथ चलती है।

भावना पांडे का आरोप है कि उर्मिला इसी वीआईपी रुतबे को पाने के लिए अंकिता के नाम का सहारा ले रही हैं। फिलहाल, यह मामला उत्तराखंड की राजनीति और सोशल मीडिया पर एक ‘भरोसे के संकट’ में फंस गया है।

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