उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित VIP एंगल को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज है। मामले से जुड़े पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौड़ और अभिनेत्री उर्मिला सनावर की ओर से नार्को टेस्ट के लिए लिखित सहमति दिए जाने की खबरों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस प्रक्रिया से सामने आने वाली जानकारी अदालत में किसी को दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त होगी। कानूनी विशेषज्ञों के लिए इस सवाल का जवाब केवल नार्को टेस्ट तक सीमित नहीं है। भारतीय कानून में किसी व्यक्ति की ओर से टेस्ट के दौरान कही गई बात और उस जानकारी के आधार पर सामने आए स्वतंत्र साक्ष्य के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। इसलिए नार्को टेस्ट को अपने आप में अपराध साबित करने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। क्या होता है नार्को टेस्ट? नार्को टेस्ट एक ऐसी फॉरेंसिक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति को चिकित्सकीय निगरानी में कुछ दवाएं देकर ऐसी अवस्था में लाने का प्रयास किया जाता है, जिसमें उससे सवाल पूछे जाते हैं। आम बोलचाल में इसे कभी-कभी ‘ट्रुथ सीरम टेस्ट’ भी कहा जाता है। हालांकि, यह मानना सही नहीं है कि इस प्रक्रिया में व्यक्ति हमेशा सच ही बोलता है।दवाओं का असर व्यक्ति की मानसिक स्थिति, याददाश्त और जवाब देने की क्षमता पर अलग-अलग तरह से पड़ सकता है। इस दौरान सामने आने वाली जानकारी की स्वतंत्र जांच जरूरी होती है। केवल किसी व्यक्ति के बयान के आधार पर किसी आरोप को सत्य नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है? साल 2010 में सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिना सहमति नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ और ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी से जुड़े कुछ परीक्षणों को असंवैधानिक ठहराया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसे परीक्षणों से गुजरने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत स्वयं के विरुद्ध गवाही देने से संरक्षण और अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर परिस्थिति में सहमति से होने वाला नार्को टेस्ट भी प्रतिबंधित है। अदालत ने स्वैच्छिक परीक्षण के लिए निर्धारित सुरक्षा उपायों और कानूनी प्रक्रिया का महत्व स्वीकार किया था। क्या नार्को टेस्ट का बयान अदालत में सबूत बन सकता है? नार्को टेस्ट के दौरान दिए गए बयान को अपने आप में अपराध साबित करने वाला निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जाता। अदालत में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए कानून के अनुसार स्वीकार्य साक्ष्य और मामले की परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाता है। यदि टेस्ट के दौरान कोई ऐसी जानकारी मिलती है, जिससे जांच एजेंसी किसी हथियार, वस्तु या अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य तक पहुंचती है, तो उस आधार पर हुई बरामदगी की कानूनी अहमियत हो सकती है। हालांकि, बरामदगी का स्वीकार्य होना और उसका किसी आरोपी के खिलाफ पर्याप्त प्रमाण होना अलग-अलग प्रश्न हैं। अदालत बरामदगी की परिस्थितियों, उसकी विश्वसनीयता और अन्य साक्ष्यों के साथ उसके संबंध की जांच करती है। क्या सहमति देने के बाद व्यक्ति पीछे हट सकता है? नार्को टेस्ट के लिए लिखित सहमति देना अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता कि परीक्षण हर हाल में कराया ही जाएगा। ऐसी प्रक्रिया में स्वैच्छिक सहमति, निर्धारित सुरक्षा उपायों और लागू कानूनी निर्देशों का पालन जरूरी होता है। यदि व्यक्ति अपनी सहमति वापस लेता है या परीक्षण से इनकार करता है, तो जांच एजेंसी को लागू कानून और न्यायालय के निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ना होता है। सहमति वापस लेने के परिणामों का निर्धारण संबंधित परिस्थितियों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा। इसे अपने आप में अपराध स्वीकार करने या दोषी होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अंकिता भंडारी केस में अब किस बात पर रहेगी नजर? अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित VIP से जुड़ी चर्चाओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जांच एजेंसी को कौन-से सत्यापित और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य मिलते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल ऑडियो, उसमें कथित तौर पर लिए गए नाम और संबंधित व्यक्तियों के दावों की पुष्टि स्वतंत्र जांच के जरिए होना जरूरी है। सुरेश राठौड़ और उर्मिला सनावर की ओर से नार्को टेस्ट के लिए सहमति दिए जाने की खबरों को जांच की प्रक्रिया के एक घटनाक्रम के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इससे किसी व्यक्ति की संलिप्तता साबित नहीं होती। आगे की कानूनी स्थिति अदालत के आदेशों, जांच में सामने आने वाले तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगी। कुल मिलाकर, नार्को टेस्ट जांच में सुराग जुटाने का एक माध्यम हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में अपराध साबित करने का शॉर्टकट नहीं है। अंकिता भंडारी मामले में भी निर्णायक महत्व उन तथ्यों और साक्ष्यों का होगा, जिन्हें जांच एजेंसी कानून के अनुरूप स्थापित कर सकेगी। Please follow and like us: Share Post Share Post navigation कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला ने लिया VRS, उत्तराखंड वन विभाग में फिर उठे सवाल