दो साल चार महीने बाद भी नहीं मिला हरिद्वार हत्याकांड का कोई सुराग

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बहादराबाद थाना क्षेत्र में पतंजलि से पहले पुल के नीचे नदी में प्लास्टिक के कट्टे में बंद मिली युवती की लाश का रहस्य आज भी बरकरार है। इस वारदात को हुए पूरे 868 दिन यानी दो साल, चार महीने और पंद्रह दिन बीत चुके हैं। पुलिस और सीआईयू की टीमों ने हर पहलू से जांच की और कई राज्यों की खाक छानी लेकिन आज तक न तो शव की शिनाख्त हो सकी और न ही हत्यारों का कोई सुराग लग पाया। जांच के बाद अब पुलिस ने इस मामले की फाइल पर एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लगाकर इसे बंद कर दिया है। मामला 10 जून 2023 की सुबह का है जब पतंजलि से पहले पुल के ठीक नीचे नदी में एक भैंसा-बुग्गी चलाने वाले शख्स ने प्लास्टिक के कट्टे में बंद एक शव देखा था। कट्टे के ऊपरी हिस्से से पैर नजर आ रहे थे जबकि पूरा शरीर अंदर बंद था। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जब कट्टा खोला तो अंदर से 20 से 25 साल की एक युवती का शव मिला। युवती के हाथ-पैर बंधे हुए थे गले पर रस्से से कसे जाने के निशान थे और शरीर पर चोटें भी मिली थीं। शव की पहचान नहीं हो सकी थी। पोस्टमार्टम में हत्या की पुष्टि होने के बाद पुलिस ने अज्ञात में हत्या का मुकदमा दर्ज किया और तीन से चार टीमें जांच में लगाईं। पुलिस ने हाईवे और आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब सहित कई राज्यों में टीमें शिनाख्त के लिए भेजी गईं, लेकिन सफलता नहीं मिली। पुलिस को शक था कि युवती की हत्या कहीं और की गई और शव को हरिद्वार लाकर नदी में फेंक दिया गया। इस आधार पर नदी किनारे के गांवों में पूछताछ की गई लेकिन कोई सुराग हाथ नहीं लगा। भविष्य में पहचान के लिए डीएनए सैंपल भी संरक्षित कराए गए मगर अब तक किसी भी परिवार ने शव पर दावा नहीं किया है।लंबे समय तक कोई साक्ष्य न मिलने के कारण यह केस अनसुलझा रह गया है। 25 अक्टूबर को इस प्रकरण को 868 दिन पूरे हो गए। दो साल से अधिक समय बीत जाने के बाद अब पुलिस रिकॉर्ड में यह केस एक ब्लाइंड मर्डर मिस्ट्री बनकर रह गया है। एक पुलिस अफसर ने नाम न छापने की शर्त पर मुकदमे में फाइनल रिपोर्ट (एफआर) लगाए जाने की पुष्टि की है। विभाग ने कहा है कि अब आगे कोई ठोस सुराग मिलने पर ही केस को दोबारा खोला जाएगा। साक्ष्य मिलने पर दोबारा वहीं से शुरू होगी जांच पुलिस महकमे में सेवाएं दे चुके सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं कि ऐसे केस बंद नहीं होते हैं। ये अलग विषय है कि जांच जहां तक पहुंची वहीं पर उसमें समय-सीमा को देखते क्लोज करते हुए रिपोर्ट लगा दी जाती है लेकिन अगर किसी भी हालत में उस केस से जुड़ा कोई साक्ष्य मिलता है तो जांच फिर से वहीं से शुरू होती है जहां से क्लोज की जाती है। कई बार आवश्यकता पड़ने पर तत्कालीन विवेचक को भी उस प्रकरण में शामिल किया जाता है।

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