पिथौरागढ़ में नाबालिग छात्रा के गर्भपात मामले में बड़ा खुलासा, DNA रिपोर्ट से बदला जांच का रुख; शिक्षक नहीं, किशोर निकला नवजात का जैविक पिता - Uttarakhand Samachar

पिथौरागढ़ में नाबालिग छात्रा के गर्भपात मामले में बड़ा खुलासा, DNA रिपोर्ट से बदला जांच का रुख; शिक्षक नहीं, किशोर निकला नवजात का जैविक पिता

पिथौरागढ़: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने और कथित रूप से जबरन गर्भपात कराए जाने के मामले में जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ है। करीब तीन महीने पहले सामने आए इस मामले में एक शिक्षक के खिलाफ दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने जांच के बाद शिक्षक के खिलाफ न्यायालय में आरोप-पत्र भी दाखिल कर दिया था। हालांकि, बाद में सामने आई DNA जांच रिपोर्ट ने मामले की दिशा बदल दी। फोरेंसिक जांच में यह स्पष्ट हुआ कि मृत नवजात का जैविक पिता आरोपी शिक्षक नहीं है। पुलिस ने इसके बाद जांच का दायरा बढ़ाया और अन्य संदिग्धों के DNA नमूने जांच के लिए भेजे। रिपोर्ट में एक विधि-विवादित किशोर के नवजात का जैविक पिता होने की पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस ने तीन नवंबर को संबंधित किशोर को अपने संरक्षण में लिया और किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया। बोर्ड के आदेश पर उसे अल्मोड़ा स्थित राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह भेज दिया गया है।

जुलाई में सामने आया था नाबालिग छात्रा के साथ गंभीर मामला

दरअसल, जुलाई 2026 में पिथौरागढ़ जिले में एक नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने और उसके साथ कथित दुष्कर्म का मामला सामने आया था। आरोप था कि छात्रा का जबरन गर्भपात कराने का प्रयास किया गया। इस मामले में शुरुआत में परिजनों ने स्कूल के एक शिक्षक पर गंभीर आरोप लगाए थे। मामले का खुलासा उस समय हुआ, जब गर्भपात की दवा दिए जाने के बाद नाबालिग की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उसे अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। स्थिति गंभीर होने पर परिजन उसे तत्काल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। वहां चिकित्सकों ने छात्रा की हालत को देखते हुए पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और पीड़िता के परिजनों से शिकायत प्राप्त कर मुकदमा दर्ज किया।

शिक्षक के खिलाफ BNS और पॉक्सो एक्ट में दर्ज हुआ था मुकदमा

पीड़िता के परिजनों की शिकायत और शुरुआती बयानों के आधार पर पुलिस ने स्कूल के एक शिक्षक के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया था। शिक्षक पर नाबालिग के साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(1) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5/6 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। पुलिस ने शुरुआती जांच के आधार पर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ाई और 24 जुलाई 2026 को न्यायालय में आरोप-पत्र भी दाखिल कर दिया था। उस समय जांच में सामने आए तथ्यों और परिजनों की शिकायत के आधार पर शिक्षक को आरोपी बनाया गया था। हालांकि, मामले में DNA जांच की रिपोर्ट आने के बाद पुलिस को नए तथ्य मिले। रिपोर्ट में शिक्षक का DNA मृत नवजात के जैविक नमूने से मेल नहीं खाया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि नवजात का जैविक पिता शिक्षक नहीं है। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच को नए सिरे से आगे बढ़ाते हुए अन्य संभावित संदिग्धों के नमूने जुटाने की प्रक्रिया शुरू की।

7 से 8 महीने की गर्भावस्था के दौरान सामने आया था मामला

जांच से जुड़ी जानकारी के अनुसार, घटना के समय नाबालिग छात्रा लगभग सात से आठ महीने की गर्भवती थी। कथित रूप से गर्भपात कराए जाने के बाद भ्रूण को जंगल में फेंक दिया गया था। पुलिस ने मामले की जांच के दौरान मिली जानकारी और निशानदेही के आधार पर भ्रूण के अवशेष एकत्र किए। इसके साथ ही मृत नवजात के जैविक नमूने भी सुरक्षित किए गए, ताकि DNA जांच के माध्यम से उसके जैविक पिता की पहचान की जा सके। पुलिस ने इन नमूनों को जांच के लिए रुद्रपुर स्थित क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा था। DNA जांच इस मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हुई। शुरुआती रिपोर्ट में शिक्षक का DNA नवजात के नमूनों से मेल नहीं खाया। इसके बाद पुलिस ने केवल पहले से नामजद आरोपी तक जांच सीमित रखने के बजाय दूसरे संभावित संदिग्धों की भी जांच शुरू की।

दो अन्य संदिग्धों के DNA नमूने जांच के लिए भेजे गए

शिक्षक की DNA रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया। मामले में दो अन्य संदिग्धों की पहचान कर उनके रक्त के नमूने 12 अक्टूबर को DNA जांच के लिए क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजे गए। फोरेंसिक प्रयोगशाला से प्राप्त रिपोर्ट में दोनों संदिग्धों में से एक विधि-विवादित किशोर का DNA मृत नवजात के जैविक नमूनों से मेल खा गया। इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस को नवजात के जैविक पिता की पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य मिला। रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस ने मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू की। तीन नवंबर को संबंधित किशोर को पुलिस ने अपने संरक्षण में लिया। इसके बाद उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया।

किशोर न्याय बोर्ड के आदेश पर अल्मोड़ा भेजा गया किशोर

पुलिस ने DNA रिपोर्ट और जांच में सामने आए वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर संबंधित किशोर को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया। बोर्ड ने मामले पर सुनवाई के बाद उसे अल्मोड़ा स्थित राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह भेजने का आदेश दिया। इसके बाद किशोर को संप्रेक्षण गृह भेज दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद मामले की जांच में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पहले शिक्षक के खिलाफ दर्ज मुकदमे और दाखिल आरोप-पत्र के बाद अब DNA रिपोर्ट में उसके जैविक पिता होने की पुष्टि नहीं हुई है। वहीं, जांच में दूसरे किशोर का DNA नवजात से मेल खाने की बात सामने आई है।

DNA रिपोर्ट ने जांच को दी नई दिशा

पिथौरागढ़ का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच की दिशा बदली है। शुरुआत में परिजनों की शिकायत के आधार पर शिक्षक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और पुलिस ने आरोप-पत्र भी दाखिल किया। लेकिन DNA जांच में शिक्षक का नमूना मेल नहीं खाने के बाद पुलिस ने अन्य संदिग्धों की जांच की, जिसमें एक किशोर का DNA नवजात से मेल पाया गया। फिलहाल मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है। जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर ही संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी तय होगी। नाबालिग पीड़िता की पहचान और उससे जुड़ी निजी जानकारी कानून के तहत गोपनीय रखी जानी आवश्यक है।

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