उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग के आदेशों के पालन को लेकर हरिद्वार विकास प्राधिकरण (HRDA) से जुड़ा एक मामला सामने आया है। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत जानकारी उपलब्ध नहीं कराने के मामलों में HRDA के लोक सूचना अधिकारी (PIO) प्रशांत कुमार सेमवाल पर राज्य सूचना आयोग की ओर से कुल 30,500 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। दावा है कि नवंबर 2023 से अब तक इस जुर्माने की रकम जमा नहीं हुई है। मामले का खुलासा आरटीआई क्लब उत्तराखंड (पंजीकृत) के सदस्य और ज्वालापुर, हरिद्वार निवासी अजीत सिंह चौहान की ओर से दाखिल की गई एक आरटीआई के जवाब से हुआ है। चौहान ने राज्य सूचना आयोग से जानकारी मांगी थी कि प्रशांत कुमार सेमवाल पर किन मामलों में कितना जुर्माना लगाया गया और उसमें से कितनी राशि सरकारी खाते में जमा हुई। आयोग की ओर से 9 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध कराए गए जवाब के मुताबिक, अपील संख्या 35920, 43624 और 44490 तथा शिकायत संख्या 16247 से जुड़े मामलों में 1 नवंबर 2023 से अब तक कुल 30,500 रुपये का जुर्माना लगाया गया। हालांकि, जुर्माने की रकम जमा किए जाने को लेकर आयोग के रिकॉर्ड में कोई पत्राचार या भुगतान संबंधी प्रमाण उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है। तीन साल बाद भी वसूली पर सवाल मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि सूचना आयोग के आदेश के बाद भी जुर्माने की राशि की वसूली नहीं हो सकी है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि सूचना आयोग की ओर से लगाए गए दंड के अनुपालन और उसकी वसूली की निगरानी किस स्तर पर की जा रही है। आरटीआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि सूचना का अधिकार कानून का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। ऐसे में यदि लोक सूचना अधिकारी समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराते और आयोग द्वारा लगाए गए जुर्माने का भी लंबे समय तक भुगतान नहीं होता, तो इससे आयोग के आदेशों के प्रभावी अनुपालन पर सवाल खड़े होते हैं। आरटीआई के जरिए सामने आया मामला अजीत सिंह चौहान की ओर से मांगी गई जानकारी में जुर्माने की राशि और उसकी वसूली से संबंधित विवरण मांगा गया था। आयोग के जवाब में जुर्माना लगाए जाने की जानकारी तो दी गई, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड में संबंधित अधिकारी द्वारा रकम जमा किए जाने का कोई प्रमाण नहीं मिलने की बात सामने आई। इस खुलासे के बाद आरटीआई कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि आयोग द्वारा लगाए गए जुर्माने की प्रभावी वसूली के लिए क्या व्यवस्था है और संबंधित विभाग इस तरह के आदेशों के अनुपालन को लेकर कितनी गंभीरता बरतते हैं। उत्तराखंड में राज्य सूचना आयोग के प्रभाव को लेकर पुराने दौर की चर्चा करते हुए आरटीआई से जुड़े लोगों का कहना है कि पहले आयोग के आदेशों को शासन और विभागों में गंभीरता से लिया जाता था। अब यदि आयोग के आदेश के बावजूद वर्षों तक जुर्माने की रकम जमा नहीं होती है, तो यह व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करने वाला विषय है। फिलहाल इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि करीब तीन साल से लंबित 30,500 रुपये के जुर्माने की वसूली कब होगी और संबंधित विभाग तथा आयोग इस मामले में आगे क्या कार्रवाई करते हैं। यह भी देखना होगा कि इस खुलासे के बाद शासन स्तर पर मामले का संज्ञान लिया जाता है या नहीं। Please follow and like us: Share Post Share Post navigation अंकिता भंडारी केस में आज CBI कोर्ट पहुंचेंगी उर्मिला सनावर, नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट पर होगी सुनवाई उत्तराखंड के अनुरागी बंधुओं का कमाल, तीन दृष्टिबाधित भाई-बहन को मिला बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार