6,000 करोड़ के ड्रग नेटवर्क से बड़े तस्करों तक, पंजाब में नशे के खिलाफ कार्रवाई की पूरी कहानी - Uttarakhand Samachar

पंजाब में नशे का मुद्दा पिछले करीब दो दशकों से राजनीति और प्रशासन के केंद्र में रहा है। 2007 में अकाली-भाजपा सरकार सत्ता में आई, 2017 में कांग्रेस ने सरकार बनाई और 2022 में आम आदमी पार्टी सत्ता में पहुंची। तीनों सरकारों ने नशे के खिलाफ कार्रवाई का दावा किया, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि इतने वर्षों की कार्रवाई के बाद पंजाब में नशे की जड़ कितनी कमजोर हुई है। क्या ड्रग्स की सप्लाई लाइन टूटी है और क्या राज्य के युवा वास्तव में नशे से दूर हुए हैं? उपलब्ध सरकारी, पुलिस, एनसीआरबी, एनसीबी और केंद्रीय जांच एजेंसियों के आंकड़ों को देखें तो आम आदमी पार्टी सरकार के कार्यकाल में कार्रवाई का पैमाना काफी बड़ा दिखाई देता है। हालांकि ज्यादा मामले और गिरफ्तारियां अपने आप में नशे की खपत का सीधा प्रमाण नहीं हैं। इन आंकड़ों में पुलिस की सक्रियता और ज्यादा केस दर्ज होने का भी असर हो सकता है। 2007 से 2017 तक पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार रही। उपलब्ध एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार 2007 से 2011 के बीच एनडीपीएस मामलों में 30,422 गिरफ्तारियां हुईं। वहीं 2012 से 2015 के बीच यह संख्या बढ़कर 58,511 तक पहुंच गई। 2012 में 11,715, 2013 में 16,821, 2014 में 17,084 और 2015 में 12,171 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं। एनसीबी के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में पंजाब में करीब 601.88 किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई थी। इसी दौर में ड्रग्स के एक बड़े नेटवर्क ने पंजाब की राजनीति में भी हलचल पैदा की। पूर्व डीएसपी और अर्जुन पुरस्कार विजेता पहलवान जगदीश भोला को 2013 में सिंथेटिक ड्रग तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया गया। जांच के दौरान पुलिस ने नेटवर्क का आकार करीब 6,000 करोड़ रुपये का बताया। मामले की जांच आगे बढ़ने पर कई लोगों के नाम सामने आए और ड्रग तस्करी के साथ-साथ मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े पहलुओं की भी जांच हुई। 2019 में भोला को सजा सुनाई गई। इसके बाद 2024 में धनशोधन मामले में भोला समेत 17 आरोपियों को दोषी ठहराया गया और करीब 12.37 करोड़ रुपये की संपत्तियों को जब्त करने का आदेश दिया गया। 2017 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद नशे के खिलाफ कार्रवाई के लिए स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया गया। 2017 से 2021 के उपलब्ध आंकड़ों में 52,255 एनडीपीएस मामले दर्ज हुए और 68,064 गिरफ्तारियां हुईं।

इस अवधि में करीब 2,412 से 2,415 किलोग्राम हेरोइन बरामद होने की जानकारी सामने आई। इसी दौरान नशे के मामलों में राजनीतिक नेताओं पर कार्रवाई ने भी पंजाब की राजनीति को प्रभावित किया। दिसंबर 2021 में अकाली नेता और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ एनडीपीएस कानून के तहत मामला दर्ज किया गया। मजीठिया ने आरोपों से इनकार किया और बाद में उन्हें जमानत मिल गई। मार्च 2022 में भगवंत मान के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी। सरकार ने नशे के खिलाफ ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान शुरू किया और बड़े स्तर पर कार्रवाई का दावा किया। सरकार के अनुसार 2022 से 2026 के बीच 73,541 एनडीपीएस मामले दर्ज किए गए और 98,596 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान करीब 5,979 किलोग्राम हेरोइन, 93 किलो आईसीई, 3,583 किलो अफीम और करीब 8.7 करोड़ फार्मा गोलियां-कैप्सूल जब्त करने का दावा किया गया। सरकार के मुताबिक ड्रग तस्करों की संपत्तियों पर भी कार्रवाई की गई। 772 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त या ध्वस्त करने और 54.47 करोड़ रुपये की ड्रग मनी बरामद करने का दावा किया गया। सरकार ने मामलों में करीब 89 प्रतिशत दोषसिद्धि दर का भी दावा किया है।

पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई केवल छोटे तस्करों तक सीमित नहीं रही। कई मामलों की जांच आगे बढ़ने पर बड़े नेटवर्क, पुलिसकर्मियों, राजनीतिक नेताओं और अन्य प्रभावशाली लोगों तक भी पहुंची। 2012 में रंजीत सिंह कंडोला उर्फ राजा कंडोला को गिरफ्तार किया गया था। उसकी सहयोगी वानिया खन्ना को करीब 2 किलो हेरोइन के साथ पकड़ा गया और बाद में उसे 10 साल की सजा हुई। 2013 में एनआरआई अनूप सिंह काहलो को 540 ग्राम हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया गया। उसकी निशानदेही पर 16 किलो और उसके सहयोगी की कार से 10  किलो हेरोइन बरामद होने का मामला सामने आया। इसी जांच की कड़ियां आगे बढ़ने पर जगदीश भोला से जुड़े नेटवर्क की जानकारी सामने आई। भोला मामले में फार्मा कारोबारी जगजीत सिंह चहल और पूर्व अकाली नेता मनिंदर सिंह ‘बिट्टू’ औलख के नाम भी जांच के दायरे में आए। इससे ड्रग नेटवर्क और राजनीतिक संपर्कों को लेकर पंजाब में राजनीतिक बहस तेज हुई। 2017 में पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह को गिरफ्तार किया गया। उसके सरकारी क्वार्टर से 4 किलो हेरोइन, 3 किलो स्मैक, हथियार और नकदी बरामद होने का मामला सामने आया। उस पर ड्रग मामलों में आरोपियों को बचाने और नशे के नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप लगे। 2023 में एसएसपी राजजीत सिंह हुंदल को सेवा से बर्खास्त किया गया। ड्रग और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में वह फरार बताए गए और बाद में उन्हें घोषित अपराधी घोषित किया गया।

ड्रग्स मामलों में राजनीतिक नेताओं पर भी कार्रवाई हुई। 2020 में पूर्व एसएसबी सदस्य और अकाली नेता अनवर मसीह की गिरफ्तारी हुई। उनके मकान से बड़ी मात्रा में हेरोइन और ड्रग प्रोसेसिंग लैब से जुड़ा सामान मिलने का मामला सामने आया। कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा भी ड्रग मामले को लेकर जांच के घेरे में आए। उन्हें 2021 में ईडी और 2023 में पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार किया। मूल मामले में गुरदेव सिंह से 2 किलो हेरोइन बरामद होने की बात सामने आई थी। खैरा ने आरोपों से इनकार किया और 2024 में हाईकोर्ट से उन्हें जमानत मिली। बिक्रम सिंह मजीठिया ने 2022 में एनडीपीएस मामले में आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद 2025 में आय से अधिक संपत्ति से जुड़े कथित 540 करोड़ रुपये के मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई। 2024 में पूर्व विधायक सतकार कौर गेहरी को 128 ग्राम हेरोइन से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया। इसके बाद भाजपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। नशे के नेटवर्क में पुलिसकर्मियों की भूमिका के आरोप भी सामने आते रहे हैं। 2025 में पुलिस कांस्टेबल अमनदीप कौर को 17 ग्राम हेरोइन के साथ पकड़े जाने का मामला सामने आया और उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

सुखपाल सिंह खैरा के पूर्व पीएसओ जोगा सिंह को भी 2015 के एक मामले में 2025 में दिल्ली एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया। इससे यह सवाल फिर उठा कि नशे के पुराने नेटवर्क से जुड़े मामलों की जांच कितनी लंबी चलती है और आरोपियों तक एजेंसियां कितनी देर से पहुंचती हैं। मार्च 2026 में तरनतारन के सरपंच परमजीत सिंह उर्फ पम्मा से 18 किलो हेरोइन बरामद होने का मामला सामने आया। जांच में इसे सीमा-पार ड्रग नेटवर्क से जोड़े जाने की बात सामने आई। इन मामलों से साफ है कि पंजाब में नशे की समस्या केवल स्थानीय तस्करी तक सीमित नहीं है। सीमा-पार से आने वाली खेप, स्थानीय सप्लायर, बड़े नेटवर्क, मनी लॉन्ड्रिंग और कथित राजनीतिक-पुलिस कनेक्शन इसकी चुनौती को और जटिल बनाते हैं। हालांकि सरकारों की कार्रवाई के आंकड़े लगातार बड़े होते गए हैं, लेकिन इन्हीं आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि पंजाब में नशे की खपत उसी अनुपात में कम हुई है। गिरफ्तारियां और बरामदगी पुलिस कार्रवाई का पैमाना जरूर बताती हैं, लेकिन नशे की वास्तविक उपलब्धता और युवाओं में इसकी पहुंच का पूरा आकलन अलग-अलग सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतकों से ही किया जा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब में नशा एक बार फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने तस्कर गिरफ्तार हुए या कितनी हेरोइन बरामद हुई, बल्कि यह भी है कि ड्रग्स की पूरी सप्लाई चेन कितनी कमजोर हुई और युवाओं को नशे से बाहर निकालने के लिए सरकारों की कोशिशें कितनी प्रभावी साबित हुईं।

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